चौंकिए नहीं! ये मासूम हैं झारखंड के बाल सिपाही

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रांची: झारखंड पुलिस में बाल सिपाही! सुनकर आप चौंकेंगे। लेकिन, यह सच है। देश में झारखंड पहला राज्य है, जहां पुलिस जवानों, अधिकारियों के आश्रितों को नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ता है। शहीद के जज्बे को जिंदा रखने के मकसद से शहीद के आश्रित नाबालिग बेटे-बेटियों को नौकरी दे दी जाती है। 18 वर्ष की उम्र और पढ़ाई पूरी होने तक इन्हें निश्चित मानदेय दिया जाता है और बालिग होते ही नौकरी की पूरी गारंटी। पुलिस के पास इस समय 125 बाल सिपाही हैं, जिनके मन में पिता के अधूरे सपने को पूरा करने का ख्वाब पल रहा है।

सौबित परियार

तीन बहनों के बीच अकेला भाई। एक बहन की शादी हो चुकी है। दो बहनों की शादी बाकी है। इसके साथ ही मां की जिम्मेदारी भी कंधों पर है। सौबित भी उन बाल पुलिस में शामिल है, जिनके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। पिछले ही साल वह बाल पुलिस बना है। अंग्रेजी माध्यम वाले एक निजी विद्यालय में वह आठवीं का छात्र है। मौका मिला तो वह पुलिस में ही ऊंचे पद पर काम करेगा।

क्या है बाल पुलिस

झारखंड में कार्यरत पुलिसकर्मियों के शहीद या असमय निधन के बाद उनके परिवार में अगर कोई बालिग नौकरी के योग्य न हो या फिर नौकरी न करना चाहता हो तो उनके नाबालिग आश्रित को बाल पुलिस की नौकरी दी जाती है। बाल पुलिस को किसी तरह का काम नहीं दिया जाता। उन्हें सिर्फ सप्ताह में तीन दिन पुलिस ऑफिस में हस्ताक्षर करने पड़ते हंै। ये आम दिनों की तरह ही स्कूली शिक्षा पूरी करते हैं। इस दौरान इन्हें आधा वेतन दिया जाता है। मैट्रिक पास करने के बाद व 18 वर्ष उम्र होते ही इन्हें सीधे तौर पर पुलिस की नौकरी दे दी जाती है। सरकार की इस योजना से उन विधवाओं को काफी बल मिलता है, जो पति की मौत के बाद नौकरी करने की स्थिति में नहीं होती हैं।

राज्य में हैं 125 बाल पुलिस

झारखंड में बाल पुलिस के 273 पद आरक्षित हैं। 125 पदों पर बहाली हो चुकी है। बाल पुलिस के बालिग होने के बाद उसका पद फिर से रिक्त की श्रेणी में आ जाता है।

विशाल छेत्री : पिता विष्णु छेत्री की शहादत के बाद विशाल पर दादी, मां और दो बहनों की जिम्मेदारी है। तीन साल से वह बाल पुलिस में है। लक्ष्य : 16 साल का विशाल बचपन से ही पुलिस अफसर बनना चाहता है। सपना : उसका कहना है कि वह बड़े होकर पिता की तरह जांबाज बनेगा। देश की रक्षा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने से कभी नहीं चूकेगा।

ऋषभ तमांग : शहीद प्रवीण तमांग के 17 वर्षीय पुत्र ऋषभ ने इसी वर्ष मैट्रिक की परीक्षा दी है। वह पिछले तीन साल से बाल पुलिस में है। लक्ष्य : मजबूत कलेजे वाला ऋषभ एयरफोर्स में पायलट बनना चाहता है। सपना : उसे मालूम है कि पुलिस में उसकी नौकरी पक्की है, लेकिन वह देश के आसमान को सुरक्षित बनाने का सपना दिन-रात देखता है।

बिदिया गुरुंग : दारोगा बेनु गुरुंग की मौत के बाद उनकी बिटिया बिंदिया को बाल पुलिस की नौकरी मिली है। उसने इसी साल मैट्रिक की परीक्षा दी है। लक्ष्य : कंप्यूटर कोर्स कर रही बिंदिया ने पुलिस सेवा को ही अपना लक्ष्य बनाया है। सपना : बिंदिया अगले साल पुलिस में शामिल हो जाएगी। जिम्मेदारियों को ईमानदारी और बहादुरी से निभाना ही उसके जीवन का एकमात्र सपना है।

सौरभ गुरुंग : सिपाही पिता लालू गुरुंग की मौत के बाद सौरभ गुरुंग पिछले तीन साल से बाल पुलिस में है। 14 साल का सौरभ सातवीं कक्षा का छात्र है। लक्ष्य : पिता की तरह सौरभ भी खाकी वर्दी पहनने की हसरत रखता है। सपना : सौरभ की उम्र भले ही अभी छोटी है, लेकिन उसका हौसला बहुत बड़ा है। झारखंड में कानून का राज स्थापित करना ही उसकी प्राथमिकता है।

कहां कितने बाल पुलिस

रांची 11

चाईबासा 10

बोकारो 11

धनबाद 9

जमशेदपुर 8

देवघर 7

दुमका 7

गुमला 3

लोहरदगा 3

चतरा 3

कोडरमा 3

गोड्डा 3

रेल धनबाद 3

सिमडेगा 4

लातेहार 4

रेल जमशेदपुर 4

सरायकेला 5

गढ़वा 5

गिरिडीह 5

पलामू 6

इन जांबाजों से बड़ी उम्मीदें "राज्य पुलिस के शहीदों के नाबालिग आश्रितों को बाल पुलिस की नौकरी दी जाती है। पर उनसे बालिग होने तक कोई काम नहीं लिया जाता। हर महीने आधी सैलरी दी जाती है। ऐसी व्यवस्था राज्य में है।" - जीएस रथ, डीजीपी झारखंड.

Courtesy: bhaskar.com 24.04.2012


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