महिला सशक्तीकरण

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महिला सशक्तीकरण के बारे में समाज के विभिन्न वर्गों, व्यवसायों एवं आर्थिक स्तरों से जुडे़ व्यक्तियों (पुरूष व महिला दोनों) की नजर में अलग-अलग मायने हैं, दृष्टिकोण हैं। एक ओर यह महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता होना है तो दूसरे रूप में पुरूषों के समान स्थिति को प्राप्त करना। एक सोच के अनुसार पूरी तरह पाश्चात्यता या अत्याधुनिकता को अपनाना ही सशक्तीकरण है। उपरोक्त सभी सशक्तीकरण की कतिपय पहलु मात्र है। संपूर्ण एवं समग्र सशक्तीकरण वह स्थिति है जब महिला को व्यक्तित्व के विकास, शिक्षा प्राप्ति, व्यवसाय, परिवार में निर्णय का समान अवसर मिले, जब वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, शारीरिक व भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करे तथा तमाम रूढि़वादी व अप्रासंगिक रिवाजों, रूढियों के बंधनों से पूरी तरह स्वतंत्र हो।

समय के साथ महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता को केवल समाज ने, परिवारों ने, बल्कि सरकार के स्तर से भी अनुभव किया गया है। हमारे स्वतंत्र देश के संविधान में स्त्री पुरूष के आधार पर नागरिकों में भेद नहीं किया गया बल्कि समान अवसर दिये गये है। मतदान का अधिकार स्त्री को भी दिया गया जो कि स्वयं में एक क्रांतिकारी कदम था। यह उल्लेख करना प्रसांगिक होगा कि अमेरिका एंव यूरोप के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के कई दशको बाद महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया गया था। केन्द्र व राज्य सरकार के स्तर से महिलाओं एवं बालिकाओं के लिए कल्याणकारी येाजनाऐं यथा निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था, साईकल देने, अतिरिक्त पोषाहार, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, तथा स्वंय सहायता समूहों को बढ़ावा देना, छात्रवृति तथा व्यवसायिक प्रशिक्षण देने आदि के माध्यम से महिलाओं को सहायता दी जा रही है। शैक्षिक, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कार्य किये जा रहे हैं जिनके सकारात्मक परिणाम भी दिख रहे है। समय के साथ समाज, परिवारों की मानसिकता भी बदली है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की ओर सबका ध्यान गया है। नतीजन जीवन के प्रत्येक पहलुओं में नारी की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। राजनैतिक क्षेत्र, सरकारी नौकरियों, व्यवसायों, सेना, पुलिस, चिकित्सा, खेल, फैशन आदि प्रत्येक क्षेत्र में महिलाऐं सक्रिय है। हाल ही में राज्य में हुए पंचायत चुनाव, जिनमें 50 प्रतिशत पद महिलाओें के लिए आरक्षित हैं, यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक Milestone साबित होगा। किन्तु अभी महिलाओं के संपूर्ण सशक्तीकरण की दिशा में बहुत अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।

यहाँ कुछ तथ्य उल्लेखनीय है- एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के कार्य समय का 2/3 महिलाऐं कार्य करती हैं किन्तु विश्वभर में उनके हिस्से आय का केवल 10 प्रतिशत ही आता है तथा विश्व की 1 प्रतिशत से भी कम सम्पत्ति महिलाओं के स्वामित्व में है। विश्व भर में व्यस्कों, जो लिख-पढ़ नही सकते उसका 2/3 भाग महिलाऐं हैं। भारत के संदर्भ में यदि हम विभिन्न सर्वेक्षणों को न भी देखें तो आम अनुभव से यह कह सकते हैं कि

आर्थिक, शैक्षणिक रूप से अभी स्थिति काफी पिछड़ी हुई है, स्थिति संतोषजनक नही है। परिवारिक निर्णयों में सहभागिता नही है। अंधविश्वास व रूढियों के कारण लड़की का जन्म लेना बोझ और दुःख का कारण बन जाता है। परिवार में मारपीट व हिंसा की शिकार होती है, यद्यपि घरेलू हिंसा को रोकने के लिए भी कानून बनाया गया है। स्वयं की अर्जित आमदनी को भी खर्च करने का अधिकार विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में नही है, । सशक्तीकरण हेतु सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की पूर्व में चर्चा की गई है, किन्तु यह क्या मात्र सरकार का ही दायित्व है- क्या एक व्यक्ति एक परिवार या समाज की इसमें कोई भूमिका या दायित्व नही है ? बिल्कुल है। यह शत प्रतिशत परिवार एवं समाज का भी दायित्व है। क्योंकि यह किसी व्यक्ति विशेष, परिवार विशेष की नही है बल्कि दुनिया की आधी आबादी, स्त्री से जुड़ा हुआ मामला है। यह किसी घर, नगर, राज्य या राष्ट्र नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व से संबंधित मुद्दा है।

अतः महिला सशक्तीकरण के लिए परिवार, समाज, राष्ट्र सभी को मिलकर कार्य करना होगा, सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा। परिवार के स्तर पर माता-पिता की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरणार्थ बेटा व बेटी में भेद भाव की मानसिकता से अभी भी है। अधिक चिन्तनीय बात यह है कि न केवल आर्थिक रूप से पिछड़े एवं ग्रामीण परिवेश बल्कि शहरी एवं संपन्न परिवारों में भी यह भेदभाव की प्रवृति है। पुत्र की अपेक्षा पुत्री को समान अवसर न देना, इस मानसिकता को छोड़ना होगा।

सर्वप्रथम यह अनुभव करना तथा स्वीकार करना होगा कि स्त्री या महिला एक परिवार की धुरी है। इसकी भूमिका परिवार में महत्वपूर्ण है। मात्र इसलिए कि वह नौकरी पेशा नही है, या घर में आर्थिक योगदान नही देती है, तो महत्वहीन है, इस भावना को छोड़ना होगा। बेटी को उसके स्त्री होने पर गर्व होने की भावना विकसित करनी होगी। बताना होगा प्रकृति ने जो भिन्नताऐं या विशिष्टताऐं दी हैं वे सभी हीन समझने अथवा सकुचाने का कारण नही है बल्कि स्त्री व पुरूष दोनो विश्व के, प्रकृति के, समाज व परिवार के, समान रूप से महत्वपूर्ण भाग है। अतः वह भी हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कि एक पुत्र है। माता पिता का दायित्व है, कि स्वास्थ्य पोषण, शिक्षा एवं अवसर की समानता पुत्री को प्रदान करें, ताकि उसमें किसी प्रकार की हीनता की भावना न पनपे।

पुत्री को मानसिक रूप से तैयार करना भी आवश्यक है। भावनात्मक रूप से दृढ़ करना भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। इस प्रकार शारीरिक स्वास्थ मानसिक, भावनात्मक सुदृढ़ता एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए शिक्षा- यह सभी पहलू जो महिला सशक्तीकरण के अभिन्न अंग हैं। इसकी शुरूआत परिवार से होती है।

समाज की भूमिका आती है, सामूहिक रूप से प्रयास करने में। समाज का दायित्व है कि महिलाओं को एक सुरक्षित एवं स्वस्थ माहौल प्रदान करें। जो वर्ग सक्षम हैं वे महिला सशक्तीकरण में अपना सार्थक योगदान आर्थिक रूप से, नेतृत्व प्रदान कर, संगठित होकर योगदान दें। उदाहरणार्थ- विभिन्न विद्यालयों (निजी) द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा दी जा सकती है। अपेक्षाकृत जागरूक वर्ग अन्य पिछडे़ वर्गो में जागरूकता उत्पन्न करने का कार्य कर सकते है। ये सब उदाहरण मात्र हैं ऐसे अनेकानेक अन्य प्रयास हो सकते हैं।

राजस्थान एवं महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पुत्री को भी संपत्ति में बराबरी का हक दिया गया है। यह महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है। चूँकि आर्थिक आधार सशक्त होने या प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण सूचक या मानदंड आरंभ से ही रहा है। साथ ही यह आवश्यक है कि स्वयं महिलाओं को जागरूक होना होगा। स्वयं जानना होगा की आखिर उनके हक क्या हैं। स्वयं एवं सामूहिक रूप से इसके लिए वे क्या प्रयास कर सकती हैं।

यह समझना होगा कि सशक्तीकरण के मायने केवल पाश्चात्य तौर तरीके, आधुनिक वस्त्र पहनने में ही नही बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने में है। आधुनिकता अप्रसांगिक हो चुकी परमपराओं तथा मान्यताओं के बंधन से खुद को मुक्त करने एवं स्वस्थ मानसिकता अपनाने में है।

यहां यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि सशक्तीकरण का तात्पर्य पुरूषों से बराबरी, प्रतिद्वंदिता, या संघर्ष करने में नही है बल्कि प्रकृति प्रदत्त भिन्नताओं को स्वीकार कर, पूरे आत्मविश्वास से परिवार व समाज में सम्मानजनक स्थिति, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सचेत रहकर समान अधिकार प्राप्त करने में है। यह केवल सैद्धांतिक रूप से ही नहीं बल्कि वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप में भी साकार होना चाहिए।

-संपत मीणा आइपीएस, डीआइजी, रांची रेंज


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