हजारीबाग (14/07/2016): हजारीबाग में नक्सल प्रभावित आंगो के थानेदार ने जीता सबका दिल

District: 
Date of Achievement: 
14/07/2016
Nature of Work: 
Good Work

Recent Photograph of Police Events

हजारीबाग (14/07/2016): नक्सली इलाकों में गोली-बारूद से तैनात थानेदारों को तो देखा होगा, किताबों से लैस थानेदार विरले ही मिलते हैं। मकसद, सिर्फ पढ़ाई नहीं, रोजगार तक का रास्ता। कक्षा समाप्त होने के बाद नौजवानों को दौड़ने का प्रशिक्षण ताकि फौज-पुलिस में बहाली के अवसरों का यहां के नौजवान फायदा उठाएं। धीरे-धीरे पूरा वातावरण ही बदलने लगा है। नक्सली भय से शांत इलाके में बूट पटकने की आवाज दूर तक जाती है, कोई पुलिसवाला नहीं होता बल्कि बच्चे होते हैं जो सुबह-शाम मार्च-पास्ट करते हैं। घने जंगलों के बीच हजारीबाग जिले के चुरचू के अतिउग्रवाद प्रभावित आंगों में बच्चे अब खूब पढ़ते हैं। बिना डर-भय के उत्क्रमित उच्च विद्यालय के शिक्षक समय पर स्कूल में होते हैं। गांव के बच्चे शाम को पीटी व दौड़-धूप का अभ्यास करते नजर आते हैं, तो यहां के पारा शिक्षक स्कूल के बाद प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में लग जाते हैं। जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर आंगो में इस बदलाव के वाहन बने हैं आंगो थाने के थानेदार अजीत कुमार। अमानवीय अत्याचार के मामले में जब राज्य के पुलिस वालों पर अंगुली उठ रही है तो ऐसे समय में इस थानेदार ने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया है। यहां का हर ग्रामीण थानेदार को अपना मित्र मानता है या मित्रता की इच्छा रखता है। उन्होंने यह सब बंदूक की बल पर नहीं बल्कि सकारात्मक सोच और बच्चों के हाथों में किताब पकड़ा कर हासिल किया है।

शाम चार बजे पीटी : थाने से सटे आंगो उत्क्रमित हाई स्कूल में गांव के बच्चे हर दिन पीटी से लेकर शारीरिक व्यायाम का अभ्यास करते हैं। 12वीं पास बच्चों को पुलिस में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उसके मुताबिक ही लांग जंप, हाई जंप से लेकर अन्य अभ्यास प्रतिदिन कराए जाते हैं। थानेदार की इस पहल में सीमा सुरक्षा बल के जवान उनकी मदद कर रहे हैं। गांव के बच्चों को प्रोफेशनल तरीके से ट्रेनिंग दी जाती है। 30 से 40 की संख्या में बच्चे हर दिन इसमें शामिल होते हैं, जिसमें लड़कियां भी होती हैं।

क्यों हैं इस बदलाव के मायने : आंगो हजारीबाग के अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में शामिल है। पुलिस को हमेशा यहां नक्सली चुनौती देते रहे। इसी क्षेत्र में वर्ष 2003 में बारूदी सुरंग विस्फोट की घटना को अंजाम दिया गया, जिसमें 10 जवान शहीद हो गए थे। आंगो नक्सलियों के लिए सेफ जोन बन चुका था। डर इतना था कि शिक्षक भी स्कूल आने से कतराते थे। लगातार नक्सली गतिविधि की वजह से ही पुलिस को घने जंगल के बीच एक वर्ष पूर्व आंगो थाना स्थापना करनी पड़ी। थाने के स्थापना के पूर्व ही उत्क्रमति हाई स्कूल आंगो से चंद कदमों पर निर्माणाधीन पंचायत भवन को उड़ा दिया गया। इसके बावजूद स्कूल के पास ही पुराने जर्जर भवन को ठीक-ठाक कर थाने की स्थापना की गई और पहले थानेदार के रूप में अजीत कुमार को प्रभार सौंपा गया।

खुद लेते हैं कक्षाएं: थानेदार अजीत समय निकाल कर स्वयं उत्क्रमति उच्च विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते भी हैं। स्कूल में बच्चों के बीच जाकर कक्षाएं लेते हैं। बताते हैं एक सप्ताह में चार से पांच कक्षाएं स्कूल में जरूर लेता हूं। शिक्षक भी उनसे कक्षाएं लेने की आग्रह करते हैं। पुलिस का प्रयास सिर्फ बच्चों को प्रोत्साहित करने तक ही समिति नहीं है। गांव के पारा शिक्षकों को भी प्रतियोगिता परीक्षा के लिए तैयारी कराई जा रही है। पुलिस द्वारा किताबें तक उपलब्ध कराई गई हैं। गांव के 150 बुजुर्गों को छाता, 10 परिवार को गाय व प्रशिक्षण में शामिल होने वाले बच्चों को जर्सी और बूट भी आंगो पुलिस उपलब्ध कराने जा रही है।

थानेदार की पहल से काफी बदलाव हुआ है। वह गांव के बच्चों को स्कूल में ट्रेनिंग देते हैं। स्वयं आकर कक्षाएं लेते हैं। शिक्षकों में सुरक्षा का भाव आया है। उन्होंने बंदूक के बल पर नहीं अपने व्यवहार से बदलाव लाने कार्य किया है।- भागीरथ कुमार मंडल, शिक्षक आंगो उत्क्रमति विद्यालय।

थानेदार की यह पहल हम शिक्षकों के लिए प्ररेणा है। गांव के बच्चे को उन्होंने स्कूल से जोड़ने का कार्य किया है। उनके प्रयासों के लिए शिक्षक संघ उनका आभार जताता है।– रविन्द्र चौधरी, महसचिव माध्यमिक शिक्षक संघ।

Courtesy: http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/14-jul-2016-edition-Ranchi-page_9-42671-4599-212.html

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